(The Unbroken Continuum of Indian Knowledge and Science)

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समानी व आकूति:, समाना हृदयानि व:।
समानमस्तु वो मनो, यथा वः सुसहासति।। ऋग्वेद 10.191 4

Rigveda 10.191.4

ऋग्वेद का यह मंत्र कहता है कि समान विचारों से युक्त हृदय और मन हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए संतुलित, संयमित और विकसित जीवन को प्रदान करते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा की अनवरत धारा ही एक ऐसे विश्व : एक मन और एक जीवन का आधार बन सकती है और यही कारण है कि भारत और भारत के चिन्तन को विश्व में सदैव सराहना मिली है। हर कोई इस चिन्तन को अपने जीवन का अंग बनाना चाहता है।

मानव समुदाय के लिए जहाँ एक ओर भौतिक संसाधन जैसे रोटी, कपड़ा और मकान आदि मूलभूत आवश्यकता के रूप में देखे जाते हैं। कुछ का तो यह भी मानना है कि अब तो इंटरनेट भी इसी मूलभूत आवश्यकता का हिस्सा बनता जा रहा है। लेकिन दूसरी ओर आध्यात्मिकता के साथ नैतिक मूल्य भी अत्यन्त आवश्यक हैं, जिनकी उपेक्षा प्रायः कर दी जाती है। ये नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य ही भौतिक संसाधनों के संदर्भ में मानवीय आवश्यकता को समुचित आकार देने वाले होते हैं। जैसे-जैसे हमारा जीवन आध्यात्मिकता और नैतिकता से दूर होता जाता है, वैसे-वैसे हम भौतिकता को अधिक महत्त्व देने लगते हैं। इस भौतिकता पर विजय ही हमारी मानवीयता की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाती है। देश जीतना, हथियार बनाना, युद्ध करना और युद्ध में विजय प्राप्त करना, प्रति व्यक्ति आय-व्यय को बढ़ाना और विशालकाय कंक्रीट के जंगल बना डालना मानवीय समाज के विकास और उपलब्धियों का आधार बन जाते हैं। हम अपनी पृथ्वी और उसके बाद अंतरिक्ष को जीत लेना चाहते हैं और हम सब कब इस विशेष दौड़ का हिस्सा बन जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता।

यदि मानव और पशु में उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की तुलना की जाए तो यह समझना कठिन न होगा कि पशु आज भी अपनी आवश्यकताओं को संतुलित किए हुए हैं लेकिन मानव अपने सामर्थ्य के बल पर किए जा रहे विकास के नाम पर इन आवश्यकताओं को असुंतलित बना बैठा है। गाँव जहाँ नगर बन रहे हैं, वहीं नगर महानगर बन रहे हैं और महानगर पता नहीं क्या बनना चाहते हैं… यह सच है कि इस विकास ने हमें अनेक सुविधाएँ दी हैं, लेकिन यह भी मानना ही होगा कि इस विकास के द्वारा हमसे इसकी बड़ी भारी कीमत भी वसूली जा रही है, और इसकी कीमत वर्तमान पीढ़ी को ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी चुकानी ही होगी।

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भारतीय ज्ञान परम्परा मानवीय उपलब्धियों को संतुलित बनाए रखने में सदियों से प्रभावी रही है। इसकी अनवरत धारा ने सुदीर्घकाल तक भारत को विकसित, संतुलित और ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र बनाए रखा। भारतीय ज्ञान की इसी विरासत को भावी समाज की आधारशिला के रूप में स्थापित करने का एक भव्य प्रयास किया जा रहा है। जब-जब हम इस भारतीय ज्ञान परम्परा से दूर हुए तब-तब पतन को प्राप्त हुए। हम जो खो चुके थे, उसे पुनः प्राप्त करने की एक ललक अब दिखाई देने लगी है। गुलामी की मानसिकता की जकड़ से कुछ बाहर निकलने की छटपटाहट अब महसूस हो रही है और आत्मगौरव की अभिलाषा अब दृढ इच्छाशक्ति में परिणत होती नज़र आ रही है। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी के बारे में चर्चा और उसके अनुरूप कार्यशैली के विस्तार का मार्ग प्रशस्त कर रही है। यह ‘अमृतकाल’ है अर्थात् सुख (स्वर्ग) प्राप्ति का द्वार। हम सौ वर्ष के स्वातंत्र्य की ओर अग्रसर हैं और हज़ारों वर्षों के समृद्ध इतिहास के पोषक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। हमें स्वयं को भी जानना है और इस भारतीय विज्ञान के वैभव को भी और इसीलिए महर्षि मनु कहते हैं –

एतद्देशप्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः।
स्वं स्वं चरित्रं शिक्षेरन् पृथिव्यां सर्वमानवा:।। (मनुस्मृति 2.20)

etaddeśaprasūtasya sakāśādagrajanmanaḥ |
svaṃ svaṃ caritraṃ śikṣeranpṛthivyāṃ sarvamānavāḥ ||Manusmriti 2.20

इस देश में समुत्पन्न प्रत्येक भारतीय को विश्व के समस्त देशों के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत करना होगा और विश्व को सर्वोत्कृष्ट शिक्षा से जोड़ना होगा। कई बार प्रश्न किया जाता है कि विज्ञान क्या है? यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो जो हम नहीं जानते या समझते, उसे जानने या समझने का नाम है विज्ञान। विज्ञान हमारे अज्ञान को झुठलाने का नाम नहीं है। विज्ञान कभी भी अन्तिम सत्य नहीं होता, अपितु वह अंतिम सत्य की तलाश में अनवरत गतिशील होने का नाम है। भारतीय ज्ञान-परम्परा इसी सत्य की तलाश में अनवरत प्रवाहित होती रही है। इसलिए यह अधिक तार्किक, प्रायोगिक और स्थिर बन पाई है। यह किन्हीं अंधविश्वासों और आडम्बरों की धारा नहीं है। भारतीय ज्ञान परम्परा सत्य की तलाश के बेहतर मार्गों का बोध कराने में समर्थ है और यही कारण है कि वर्तमान भारत इसी ओर कदम बढ़ा रहा है।

गुलाम भारत और उसके बाद स्वतन्त्र होकर भी हमें सिखाई गई आधनिक शिक्षा और उसमें पढ़ाए गए विज्ञान की एक ख़ास बात यह रही है कि इसने भारत के प्राचीन विज्ञान को कपोल-कल्पना और झूठ साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आधुनिक विज्ञान सच कहें तो भारत की गुलाम मानसिकता का पोषक ही रहा। भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान से उन्होंने बहुत कुछ सीखा, जाना और समझा लेकिन भारतीयों को इस आत्मगौरव से दूर रखने में भी सफलता प्राप्त की। इस तरीके से हम भारत के वैभव से दूर रहे और उसकी अनवरत धारा का हिस्सा नहीं बन सके।

वर्तमान भारत इसे हमारी शिक्षा और हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने की ओर अग्रसर है। भारत के स्वत्व को जाने बिना हम स्वयं को न जान सकेंगे और स्वयं को जाने बिना हम वैश्विक विकास का सही मार्ग न बना पाएँगे। कई बार यह कहा जाता है कि आज सम्पूर्ण विश्व भारत की ओर देख रहा है लेकिन प्रश्न उठता है ऐसा क्यों हो रहा है? क्या है हमारे पास जो उनके पास नहीं है? उत्तर सिर्फ़ एक है – भारतीय ज्ञान परम्परा की अनवरत धारा। यही वह धारा है जो हमें जीवन में अभिनव लक्ष्यों का निर्धारण कराने में सहायता देती है; सुख-दुःख में स्थितप्रज्ञ बनाती है; भौतिकता और आध्यात्मिकता में सन्तुलन स्थापित करती है; दूसरे को जीतने की अपेक्षा स्वयं को जानने पर बल देती है, अभिमान से पहले गौरव का पाठ पढ़ाती है; प्राप्ति से पहले त्याग का बोध कराती है; विज्ञान के संतुलित विकास का आधार प्रदान करती है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संदेश का प्रसार करती है।

भारतीय ज्ञान परम्परा की इसी अनवरत धारा में बढ़ते हुए हम विज्ञान की सर्वसुलभ, सर्वहितकारी शाखा का विस्तार कर पाएँगे। इति अलम्…

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