ऋग्वेद का यह मंत्र कहता है कि समान विचारों से युक्त हृदय और मन हमारे और हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए संतुलित, संयमित और विकसित जीवन को प्रदान करते हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा की अनवरत धारा ही एक ऐसे विश्व : एक मन और एक जीवन का आधार बन सकती है और यही कारण है कि भारत और भारत के चिन्तन को विश्व में सदैव सराहना मिली है। हर कोई इस चिन्तन को अपने जीवन का अंग बनाना चाहता है।
मानव समुदाय के लिए जहाँ एक ओर भौतिक संसाधन जैसे रोटी, कपड़ा और मकान आदि मूलभूत आवश्यकता के रूप में देखे जाते हैं। कुछ का तो यह भी मानना है कि अब तो इंटरनेट भी इसी मूलभूत आवश्यकता का हिस्सा बनता जा रहा है। लेकिन दूसरी ओर आध्यात्मिकता के साथ नैतिक मूल्य भी अत्यन्त आवश्यक हैं, जिनकी उपेक्षा प्रायः कर दी जाती है। ये नैतिक और आध्यात्मिक मूल्य ही भौतिक संसाधनों के संदर्भ में मानवीय आवश्यकता को समुचित आकार देने वाले होते हैं। जैसे-जैसे हमारा जीवन आध्यात्मिकता और नैतिकता से दूर होता जाता है, वैसे-वैसे हम भौतिकता को अधिक महत्त्व देने लगते हैं। इस भौतिकता पर विजय ही हमारी मानवीयता की सबसे बड़ी उपलब्धि बन जाती है। देश जीतना, हथियार बनाना, युद्ध करना और युद्ध में विजय प्राप्त करना, प्रति व्यक्ति आय-व्यय को बढ़ाना और विशालकाय कंक्रीट के जंगल बना डालना मानवीय समाज के विकास और उपलब्धियों का आधार बन जाते हैं। हम अपनी पृथ्वी और उसके बाद अंतरिक्ष को जीत लेना चाहते हैं और हम सब कब इस विशेष दौड़ का हिस्सा बन जाते हैं, हमें पता ही नहीं चलता।
यदि मानव और पशु में उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की तुलना की जाए तो यह समझना कठिन न होगा कि पशु आज भी अपनी आवश्यकताओं को संतुलित किए हुए हैं लेकिन मानव अपने सामर्थ्य के बल पर किए जा रहे विकास के नाम पर इन आवश्यकताओं को असुंतलित बना बैठा है। गाँव जहाँ नगर बन रहे हैं, वहीं नगर महानगर बन रहे हैं और महानगर पता नहीं क्या बनना चाहते हैं… यह सच है कि इस विकास ने हमें अनेक सुविधाएँ दी हैं, लेकिन यह भी मानना ही होगा कि इस विकास के द्वारा हमसे इसकी बड़ी भारी कीमत भी वसूली जा रही है, और इसकी कीमत वर्तमान पीढ़ी को ही नहीं, आने वाली पीढ़ियों को भी चुकानी ही होगी।
भारतीय ज्ञान परम्परा मानवीय उपलब्धियों को संतुलित बनाए रखने में सदियों से प्रभावी रही है। इसकी अनवरत धारा ने सुदीर्घकाल तक भारत को विकसित, संतुलित और ज्ञान-विज्ञान का केन्द्र बनाए रखा। भारतीय ज्ञान की इसी विरासत को भावी समाज की आधारशिला के रूप में स्थापित करने का एक भव्य प्रयास किया जा रहा है। जब-जब हम इस भारतीय ज्ञान परम्परा से दूर हुए तब-तब पतन को प्राप्त हुए। हम जो खो चुके थे, उसे पुनः प्राप्त करने की एक ललक अब दिखाई देने लगी है। गुलामी की मानसिकता की जकड़ से कुछ बाहर निकलने की छटपटाहट अब महसूस हो रही है और आत्मगौरव की अभिलाषा अब दृढ इच्छाशक्ति में परिणत होती नज़र आ रही है। भारत की राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 इसी के बारे में चर्चा और उसके अनुरूप कार्यशैली के विस्तार का मार्ग प्रशस्त कर रही है। यह ‘अमृतकाल’ है अर्थात् सुख (स्वर्ग) प्राप्ति का द्वार। हम सौ वर्ष के स्वातंत्र्य की ओर अग्रसर हैं और हज़ारों वर्षों के समृद्ध इतिहास के पोषक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। हमें स्वयं को भी जानना है और इस भारतीय विज्ञान के वैभव को भी और इसीलिए महर्षि मनु कहते हैं –
इस देश में समुत्पन्न प्रत्येक भारतीय को विश्व के समस्त देशों के सम्मुख एक आदर्श प्रस्तुत करना होगा और विश्व को सर्वोत्कृष्ट शिक्षा से जोड़ना होगा। कई बार प्रश्न किया जाता है कि विज्ञान क्या है? यदि सरल शब्दों में कहा जाए तो जो हम नहीं जानते या समझते, उसे जानने या समझने का नाम है विज्ञान। विज्ञान हमारे अज्ञान को झुठलाने का नाम नहीं है। विज्ञान कभी भी अन्तिम सत्य नहीं होता, अपितु वह अंतिम सत्य की तलाश में अनवरत गतिशील होने का नाम है। भारतीय ज्ञान-परम्परा इसी सत्य की तलाश में अनवरत प्रवाहित होती रही है। इसलिए यह अधिक तार्किक, प्रायोगिक और स्थिर बन पाई है। यह किन्हीं अंधविश्वासों और आडम्बरों की धारा नहीं है। भारतीय ज्ञान परम्परा सत्य की तलाश के बेहतर मार्गों का बोध कराने में समर्थ है और यही कारण है कि वर्तमान भारत इसी ओर कदम बढ़ा रहा है।
गुलाम भारत और उसके बाद स्वतन्त्र होकर भी हमें सिखाई गई आधनिक शिक्षा और उसमें पढ़ाए गए विज्ञान की एक ख़ास बात यह रही है कि इसने भारत के प्राचीन विज्ञान को कपोल-कल्पना और झूठ साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आधुनिक विज्ञान सच कहें तो भारत की गुलाम मानसिकता का पोषक ही रहा। भारत के प्राचीन ज्ञान-विज्ञान से उन्होंने बहुत कुछ सीखा, जाना और समझा लेकिन भारतीयों को इस आत्मगौरव से दूर रखने में भी सफलता प्राप्त की। इस तरीके से हम भारत के वैभव से दूर रहे और उसकी अनवरत धारा का हिस्सा नहीं बन सके।
वर्तमान भारत इसे हमारी शिक्षा और हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाने की ओर अग्रसर है। भारत के स्वत्व को जाने बिना हम स्वयं को न जान सकेंगे और स्वयं को जाने बिना हम वैश्विक विकास का सही मार्ग न बना पाएँगे। कई बार यह कहा जाता है कि आज सम्पूर्ण विश्व भारत की ओर देख रहा है लेकिन प्रश्न उठता है ऐसा क्यों हो रहा है? क्या है हमारे पास जो उनके पास नहीं है? उत्तर सिर्फ़ एक है – भारतीय ज्ञान परम्परा की अनवरत धारा। यही वह धारा है जो हमें जीवन में अभिनव लक्ष्यों का निर्धारण कराने में सहायता देती है; सुख-दुःख में स्थितप्रज्ञ बनाती है; भौतिकता और आध्यात्मिकता में सन्तुलन स्थापित करती है; दूसरे को जीतने की अपेक्षा स्वयं को जानने पर बल देती है, अभिमान से पहले गौरव का पाठ पढ़ाती है; प्राप्ति से पहले त्याग का बोध कराती है; विज्ञान के संतुलित विकास का आधार प्रदान करती है और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के संदेश का प्रसार करती है।
भारतीय ज्ञान परम्परा की इसी अनवरत धारा में बढ़ते हुए हम विज्ञान की सर्वसुलभ, सर्वहितकारी शाखा का विस्तार कर पाएँगे। इति अलम्…
Associate Professor, Department of Sanskrit, SPC Govt. College, Ajmer, Rajasthan, Bharat
Dr. Ashutosh Pareek
Acharya (M.A. in Traditional Sanskrit), Shiksha Shastri, M. A. in Education, NET, Ph. D.
Dr. Ashutosh Pareek is a passionate Sanskrit Promoter. He is working as an Associate Professor, Department of Sanskrit, S.P.C. Govt. College, Ajmer, Rajasthan. He has teaching experience of 15 Years and the journey is ongoing. He is Registered Research Guide in Research Department of M.D.S. University, Ajmer. He promotes Sanskrit through workshops, symposiums, talks & writing on topics related to Indian Knowledge System.
He successfully completed 2 Research Projects funded by Regional Centre, UGC, Bhopal. Participated and paper presented in more than 100 National/International Seminars, Conferences and Symposiums. He has been invited as a resource person in various societies, institutions and academic programmes. He has organized workshops, training programmes and orientations for students as well as for teachers.
He was Member of authors’ committee for writing 3 textbooks for the students of classes 6 to 8 (रंजिनी - भाग 1, 2 & 3) prepared by SIERT, Udaipur in association with RSTB, Jaipur. Also a member of authors’ committee for writing textbook for the students of class 11 (सत्प्रेरिका) prepared by RBSE, Ajmer in association with RSTB, Jaipur. He has authored 4 reference books - 1. अभिनवभारतस्य युगचेतनाया: प्रणेता महर्षिः दयानन्दसरस्वती (संस्कृतमहाकाव्यानां समीक्षात्मिकी दृष्टिः) 2. सामाजिक चेतना के संवाहक स्वामी दयानंद सरस्वती (संस्कृत महाकाव्यों के विशेष सन्दर्भ में). 3. Nutrition and Brain Development of A Foetus (Ancient and Modern Scientific Perspectives). 4. संस्कृत में नवाचार. 5.
He is Co-editor of "Shodh Navneet" an International Refereed Research Journal. He is also a Member of Editorial board of "E-Swadeshi Vigyan Patrika". More than 60 Research Articles published in various International/National Journals/Magazines with ISSN number as well as high impact factor.
He is a Life Member of Swadeshi Science Movement, New Delhi; All India Oriental Sanskrit Conference; Social Science & Humanities Association (SSHA); Lok Bhasha Prachar Samiti etc.
He actively participates in various activities to promote Sanskrit language as well as Indian Culture and Science associated with Ancient Sanskrit Literature. He has received various awards and commendations for his social and academic works. He is also associated with “संस्कृत, संस्कृति और विज्ञान का समागम - संस्कृतायनम्” a social media platform on Linkedin, FB, YT & Telegram with more than 25 K followers.
संस्कृत भाषा हर युग के विद्यार्थी, शिक्षक और समाज के हृदय की भाषा बनने की सामर्थ्य रखती है. समाज संस्कृत से जुड़ना चाहता है किन्तु सम्भवतः हम उनके हृदय तक पहुँच विकसित करने में पूरी तरह से सफल नहीं हो पाए हैं. अतः संस्कृत और समाज को जोड़ने का यह एक प्रयास है. “संस्कृतायनम्” के…
भाग 6 संस्कृत, संस्कृति और ज्ञान-विज्ञान : एक अनुपम संगम भारतीय ज्ञान-विज्ञान की अनन्त शाखाएँ और अनन्त संभावनाएँ (Infinite branches and infinite possibilities of Indian knowledge and science) “वेद सब सत्यविद्याओं का पुस्तक है। वेद का पढ़ना-पढ़ाना और सुनना-सुनाना सब आर्यों का परम धर्म है।” – स्वामी दयानंद सरस्वती, आर्यसमाज का तीसरा नियम वैदिक साहित्य…
“भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे, संस्कृतं संस्कृतिस्तथा।।” प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की गौरवमयी परंपरा समस्त जगत् को आलोकित करने वाली है। संस्कृत भाषा में ज्ञान-विज्ञान की महती शृंखला है जो वर्तमान वैज्ञानिक जगत् के लिए कौतूहल का विषय ही है। आज जहाँ एक ओर आधुनिक विज्ञान समुन्नत अवस्थिति में दिखाई दे रहा है, वहीं दूसरी ओर इसके दोष…
भारतीय संस्कृति : एक अनुपम यात्रा – सोपान – 1 “भारतस्य प्रतिष्ठे द्वे, संस्कृतं संस्कृतिस्तथा।।” भारत के भारत होने का मूल है संस्कृत और संस्कृति। “संस्कृति” जीवन का आधार है और “संस्कृत” उससे जुड़ने का सशक्त माध्यम। इन दोनों की पारस्परिक सुदृढता ही भारत को (भा+रत) “भा” अर्थात् ज्ञान रूपी प्रकाश में “रत” लगातार अग्रसर…
“संगच्छध्वं संवदध्वं, सं वो मनांसि जानताम्। देवा भागं यथा पूर्वे, सञ्जानाना उपासते।।” ऋग्वेद 10.191.2 “साथ चलने, एक स्वर में बोलने और एक दूसरे के मन को जानने वाला समाज ही अपने युग को बेहतर बनाने की सामर्थ्य से युक्त हो सकता है और ऐसे युग में जीने वाले स्वयं के लिए बेहतर वर्तमान और आने…
संस्कृतव्यक्तित्वम् | Sanskrit Personalities ऊपर एक चित्र दिया गया है। ध्यान से देखकर इनके नाम बताइए: आधुनिक काल में संस्कृत भाषा के अनेक समुपासकों में से कुछ मोती यहाँ हैं और ऐसे अनेक रत्न संस्कृत समाज को गति प्रदान कर रहे हैं। इन रत्नों के बारे में जानना प्रत्येक संस्कृतानुरागी के लिए हर्ष और उत्साह…